Imaan Ka Markaz wa Mehvar : Zaat-e-Mustufaﷺ (Hindi)

160.00

Category –Sirat o Fazail

Author : Shaykh-ul-Islam Dr Muhammad Tahir-ul-Qadri
Language : HIndi
Pages : 160
Binding : Softcover
Description

सहाबए किराम अपनी महब्बत का मर्कज़ो महह्वर हुजूर ॐ को जाते अब्दस को समझते थे। इसलिये आप की हद्द दर्जा ता’ज़ीम और गायत दर्जा तकरीम किया करते थे। चूंकि मर्कज़ो महह्वर हुजूर की जाते गिरामी थी इसलिये हर जिहत से आप के साथ अपना रब्तो तअल्लुक् इतना गहरा उस्तुवार करते थे कि हद न रहती थी। वो जानते थे कि हुजूर की जाते अक्दस के साथ जिस कद्र मज़बूत व मुस्तहकम तअल्लुक होगा उसी कुद्र ईमान भी मज़बूत व मुस्तहकम होता चला जाएगा पस यही एक गर और राज़ थो जिसे वो समझ गए थे।

हम ये समझते हैं कि जिस कद्र नमाज़ें ज़्यादा होंगी उसी कुद्र ईमान मज़बूत होगा, जिस कुद्र रोज़े ज़्यादा होंगे उसी कद्र ईमान मज़्बूत होगा। जिस कद्र हज ज़्यादा होंगे ईमान उसी कद्रद मज़्बूत होगा। ये सारी इबादतें और इनकी फज़ीलतें अपनी जगह बजा लेकिन ये सब आ ‘माल मिल कर भी तन्हा ईमान को मुस्तहकम नहीं बना सकते। ईमान फिल हकीकृत इसी सूरत में मज़्बूत हो सकता है कि हुजूर सरकारे दो आलम से इश्को महब्बत वाला तअल्लुक मज़्बूत तर हो जाए। पस अगर मर्कज़ो महह्वर के साथ तअल्लुक मज़बूत तर हो गया तो फिर ईमान भी कामिल हो जाएगा और आ ‘मालो इबादात भी बा मक्सद व बा मुराद हो जाएंगे। या ‘नी ये सब आ ‘मालो इबादात ईमान के खाते में जाएंगे। और अगर ये तअल्लुक कमज़ोर पड़ गया या ‘नी महब्बत कम रह गई और अदब मल्हूज़े खातिर न रता तो नुसरत व इत्तिबाअ और इताअत वगैरह कोई भी शै ईमान के खाते में नहीं जाएगी। फिर ये सब कुछ महज़ बोझ होगा जो हम अपने कंधों पर उठाए फिरते होंगे।

Additional information
Weight 0.200 kg
Dimensions 21.5 × 14 × 0.8 cm
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